🎵 जब गूंज उठा 'जुम्मा चुम्मा दे दे': अमिताभ-रेखा के दौर की वो फिल्में जो आज भी हैं हिट

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RETRO BOLLYWOOD SPECIAL अमिताभ बच्चन और रेखा: बॉलीवुड की सबसे रहस्यमयी जोड़ी, ब्लॉकबस्टर फिल्में और 'जुम्मा चुम्मा' का अमर क्रेज! भारतीय सिनेमा के इतिहास में अगर किसी ऑन-स्क्रीन जोड़ी ने दर्शकों के दिलों पर सबसे गहरा प्रभाव छोड़ा है, तो वह है अमिताभ बच्चन और रेखा । एक तरफ 'एंग्री यंग मैन' अमिताभ की गंभीर शख्सियत और दूसरी तरफ अभिनय की मलिका रेखा का जादू। इस जोड़ी की केमिस्ट्री ने 70 और 80 के दशक में बॉक्स ऑफिस पर जो तूफान उठाया, उसकी गूंज आज भी सुनाई देती है। 1. दो सितारों का उदय और पहली मुलाकात Photo Credit: Pinterest अमिताभ बच्चन ने 1969 में 'सात हिंदुस्तानी' से अपने सफर की शुरुआत की थी, लेकिन 1973 की फिल्म 'जंजीर' ने उन्हें रातों-रात सुपरस्टार बना दिया। वहीं दूसरी ओर, दक्षिण भारतीय सिनेमा से बॉलीवुड में कदम रखने वाली रेखा ने 1970 की फिल्म 'सावन भादों' से अपनी खास पहचान बनाई। दोनों की पहली मुलाकात 1976 की सुपरहिट फिल्म 'दो अनजाने' के सेट पर हुई थी। इस फिल्म के दौरान अमिताभ के अनुशासन ने ...

के. जे. येसुदास: 50 हजार से ज्यादा गाने गाने वाले संगीत के उस महागुरु की कहानी जिसकी आवाज में साक्षात ईश्वर बसते हैं

भारतीय संगीत के इतिहास में कई महान गायक हुए हैं, लेकिन एक आवाज़ ऐसी है जिसे सुनकर ऐसा लगता है मानो साक्षात ईश्वर के दर्शन हो रहे हों। वह पवित्र और रूहानी आवाज़ है कट्टास्सेरी जोसेफ येसुदास यानी हमारे चहेते के. जे. येसुदास (K. J. Yesudas) की। संगीत जगत में उन्हें आदर से 'गाना गंधर्वन' (Celestial Singer) कहा जाता है। उन्होंने अपने सुरों से न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया को मंत्रमुग्ध किया है। आज हम संगीत के इस महागुरु के जीवन, उनके कड़े संघर्ष, बॉलीवुड में उनके धमाके और उनकी सादगी की पूरी कहानी विस्तार से जानेंगे।

1. जन्म, बचपन और संगीत की गहरी पारिवारिक नींव





के. जे. येसुदास का जन्म 10 जनवरी 1940 को केरल के खूबसूरत शहर कोच्चि (फोर्ट कोच्चि) में एक बेहद साधारण ईसाई परिवार में हुआ था। उनके घर में संगीत की जड़ें पहले से ही मजबूत थीं। उनके पिता ऑगस्टीन जोसेफ एक बहुत ही प्रसिद्ध मलयालम नाटककार, अभिनेता और शास्त्रीय संगीतकार थे। यही कारण था कि येसुदास जी को बचपन से ही घर में सरगम और सुरों की गूंज सुनने को मिली। उनके पिता ही उनके सबसे पहले गुरु बने और उन्होंने ही येसुदास के भीतर संगीत की चिंगारी को पहचाना।

2. आर्थिक तंगियों से भरा शुरुआती संघर्ष और संगीत साधना

भले ही उनके पिता कलाकार थे, लेकिन उस जमाने में कलाकारों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती थी। येसुदास जी का बचपन घोर गरीबी और तंगियों में बीता। कई बार उनके पास संगीत कॉलेज की फीस भरने तक के पैसे नहीं होते थे। लेकिन संगीत के प्रति उनकी दीवानगी इतनी गहरी थी कि उन्होंने भूखे पेट रहकर भी अपनी साधना को कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने तिरुवनंतपुरम के म्यूजिक कॉलेज और बाद में त्रिपुनीथुरा के आर. वी. म्यूजिक एकेडमी से शास्त्रीय संगीत (Carnatic Classical Music) की उच्च शिक्षा हासिल की। उनके गुरुओं का कहना था कि यह लड़का एक दिन संगीत के इतिहास को बदल देगा।

3. करियर की शुरुआत और पहली रिकॉर्डिंग की अनोखी कहानी

सालों की कड़ी मेहनत के बाद, साल 1961 में उन्हें पहली बार एक फिल्म में गाने का मौका मिला। 14 नवंबर 1961 को उन्होंने अपना पहला गाना रिकॉर्ड किया। दिलचस्प बात यह है कि उनका पहला गाना कोई आम गाना नहीं था, बल्कि महान समाज सुधारक श्री नारायण गुरु का एक प्रसिद्ध श्लोक था—"जाति भेदम् मत द्वेषम्..."। इस गाने ने केरल में धूम मचा दी। उनकी आवाज़ की गहराई और शुद्धता देखकर दक्षिण भारत के बड़े-बड़े संगीत निर्देशक हैरान रह गए और उनके पास गानों की लाइन लग गई।

4. 50,000 से ज्यादा गानों का एक ऐसा अटूट रिकॉर्ड जो इतिहास है

के. जे. येसुदास जी केवल किसी एक भाषा के गायक नहीं हैं, बल्कि वे एक बहुभाषी महानायक हैं। उन्होंने अपने 60 साल से भी लंबे शानदार करियर में 50,000 से अधिक गाने रिकॉर्ड किए हैं। उन्होंने मलयालम, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, हिंदी, बंगाली, ओडिया, अरबी, अंग्रेजी और लैटिन जैसी कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अपनी आवाज़ दी है। एक ही दिन में 11-11 गाने रिकॉर्ड करने का अनोखा रिकॉर्ड भी उनके नाम दर्ज है। उनकी इस अद्भुत उपलब्धि के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के तीनों सर्वोच्च नागरिक सम्मानों—पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से नवाजा है।

5. जब बॉलीवुड में गूंजी आवाज़ और 'चितचोर' से मचाया धमाल

दक्षिण भारत में अपनी बादशाहत कायम करने के बाद, जब येसुदास जी ने 1970 के दशक में बॉलीवुड (हिंदी सिनेमा) का रुख किया, तो वहाँ के दिग्गज भी उनके सुरों के कायल हो गए। महान संगीतकार रवींद्र जैन ने उनकी आवाज़ को पहचाना और फिल्म 'चितचोर' (1976) में उन्हें गाने का मौका दिया। इस फिल्म का गाना "गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा" आज भी हर रेडियो स्टेशन और संगीत प्रेमी की पहली पसंद है। इसके अलावा उनके गाए हुए अन्य गाने जैसे—

  • जब दीप जले आना (फिल्म: चितचोर) - शास्त्रीय संगीत और बॉलीवुड का अद्भुत संगम।
  • चांद जैसे मुखड़े पे (फिल्म: सावन को आने दो) - प्यार और सादगी से भरा गीत।
  • सुरमई अंखियों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा (फिल्म: सदमा) - लोरी के रूप में गाया गया अब तक का सबसे भावुक और अमर गाना।

इन गानों के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (National Film Award) से भी सम्मानित किया गया। वे कुल 8 बार सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके हैं, जो अपने आप में एक बहुत बड़ा रिकॉर्ड है।

6. सादगी, अनुशासन और आवाज़ को अमर रखने का कड़ा नियम

रेडियो हिंदुस्तान एफएम (Radio Hindustaan FM) के हमारे सभी श्रोताओं और पाठकों को यह जानकर बेहद प्रेरणा मिलेगी कि इतनी बड़ी वैश्विक सफलता और धन-दौलत कमाने के बाद भी येसुदास जी का जीवन एक संत की तरह है। वे हमेशा केरल की पारंपरिक सफेद मुंडू (धोती) और सफेद कमीज में ही नजर आते हैं। उनकी सादगी का हर कोई दीवाना है। इसके साथ ही, अपनी आवाज़ की मिठास और शुद्धता को बनाए रखने के लिए वे एक बेहद कड़े अनुशासन का पालन करते हैं। वे कभी भी ठंडी चीजें, खट्टा, या तली-भुनी चीजें नहीं खाते। दशकों से उनका यह नियम अटूट है, यही वजह है कि 80 वर्ष से अधिक की उम्र में भी जब वे गाते हैं, तो उनकी आवाज़ वैसी ही सुरीली लगती है जैसी 25 साल की उम्र में लगती थी।

7. येसुदास जी के जीवन से मिलने वाली बड़ी सीख

के. जे. येसुदास जी का पूरा जीवन हमें यह सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि आप अपने लक्ष्य के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं और लगातार अभ्यास (रियाज़) करते हैं, तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। उन्होंने संगीत को कभी धंधा नहीं माना, बल्कि इसे भगवान की पूजा की तरह जिया है।

निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में कहें तो, के. जे. येसुदास जी भारतीय संगीत जगत के एक चमकते हुए ध्रुवतारे हैं। उनकी रूहानी आवाज़ आने वाली कई पीढ़ियों को सुकून और प्रेरणा देती रहेगी। जब भी रेडियो हिंदुस्तान एफएम पर उनका कोई गाना बजता है, तो समां बंध जाता है।



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